आजकल लिटरेचर फेस्टिवल हर शहर में होते हैं। टीवी चैनल से लेकर छोटी मोटी संस्थाए कराती ही रहती हैं।हाथ में किताबें रखना, कैफ़ में किताब पढ़ना और किताबों और लेखकों के बारे में बात करना फैशनेबल है। लेकिन क्या वाक़ई लोग किताबें पढ़ रहे हैं। घरों में लाइब्रेरी रखने का चलन बढ़ा है, लेकिन क्या पढ़ने का चलन भी बढ़ा है। नहीं। यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा का एक रिसर्च कहता है कि अमेरिका में ही पढ़ने का चलन बीते बीस वर्षों में ४० फ़ीसदी तक घटा है। सही भी लगता है क्योंकि हम सब सोशल मीडिया के ऐसे अथाह जंगल में हैं। जहां एक बार घुसने का मतलब है कि बिना मंजिल का एक सफ़र। ऐसे में धीमी रफ्तार का सिनेमा, जीवन की तपती दौड़ धूप में शीतल छांव की तरह है। जापानी फ़िल्म परफ़ेक्ट डेज़ के बाद एक ऐसी ही फ़िल्म 8 AM की लास्ट लोकल देखी। फ़िल्म में एक नायक है, एक नायिका है। किताबें हैं। अपने अपने जीवन के छोटे सुख हैं तो डर भी हैं। इरावती को अपने हाथ की कॉफ़ी जिस तरह का सुख देती है, वो समझा जा सकता है। वो कविताएँ लिखती है। उसकी दुनिया छोटी सी है। घर पर पति और बच्चों की देखभाल के बाद जो वक्त हाथ में आता है, उसे…वो अपने मुताबिक बिताना अ्च्छा लगता है। नायक के तौर पर गुलशन देवरा है। वो किताबों की दुनिया में रहता है। उसकी अपनी दुनिया में किताबें उसके साथी हैं। वो उनसे बातें करता है। अपने रहस्यमयी दुखद जीवन की गुत्थियाँ सुलझाने की थ्योरी किताबों से लेता है। दोनों के रास्ते टकराते हैं। उनके संबंध को शशि देशपांडे के नॉवेल शिप्स दैट पास की एक लाइन से समझाने की कोशिश की गई है। लाइन नॉवेल से ली गई है- जो फ़िल्म में डायलॉग की शक्ल में है। उसमें कहा गया है कि
दोनों, रात में समंदर से गुज़रते उन जहाज़ों की तरह से है, जो शांति से एक दूसरे के किनारे से गुज़र जाते हैं। लेकिन क्या वाक़ई ऐसा है। शायद नहीं क्योंकि अगर दोनों बिना एक दूसरे पर असर डाले, गुज़र जाते तो इरावती में इतना आत्मविश्वास कहाँ से आता कि वो अपनी कविताओं को एक किताब की शक्ल दे देती है। कैसे नायक अपने उलझे भारी अतीत के बोझ को कंधों और ज़हन से उतारता। जीवन को धीमी रफ्तार में जीना हर किसी के बस की बात नहीं, और ना ही ये हर किसी के लिए है। उसके लिए खुद के साथ
बैठना पड़ता है। लगातार बाहरी दुनिया के साथ संपर्क बनाए रखने और इंगेज रहने से लोग ये क़ाबिलियत खो देते हैं।आजकल
का भागदौड़ वाला जीवन इरावती की तसल्ली वाली कॉफ़ी और प्रीतम के किताबों में खोए रहने की अहमियत समझने के लिए वक्त देता है और ना ही सहूलियत। धीमा जीवन जीना अब एक कला में तब्दील हो रहा है, जिसे बिन बात हाँफ रहे लोग समझ नहीं पाएंगे।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें